Vicky Roy – Motivational Story To Become Millionaires By Taking Garbage in Hindi

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आपने स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म तो देखी ही होगी लेकिन क्या कभी किसी कूड़ा उठाने वाले को करोड़पति बनते हुए सुना है और वो भी किसी लॉटरी के जरिये नहीं बल्कि अपनी मेहनत के दम पर. आज हम आपके साथ एक ऐसे शख्स की कहानी शेयर करने जा रहे है जो बचपन में घर से भाग जाता है और फिर स्टेशन पर कूड़ा बीनने का काम करता है लेकिन अपनी लगन के कारण एक दिन वो सब पा लेता है जिसके सपने उसने खुद भी न देखे हो. इस आदमी का नाम है विक्की रॉय / Vicky Roy जिसका नाम शायद आपने पहली बार सुना हो लेकिन इसके जीवन की कहानी सभी के लिए प्रेरणा का काम करेगी.

विक्की रॉय एक गरीब परिवार से आये थे . उसके अलावा, उसकी तीन बहने और भाई थे. अपनी मां से पीटा जाना उनके लिए सामान्य था. रॉय को घुमने फिरने का बहुत शोक था लेकिन उसे बचपन से ही अन्य बच्चों के साथ खेलने की अनुमति नहीं थी, और जब उसके माता-पिता काम की तलाश में चले गए, तो उसे उसके नाना नानी के साथ छोड़ दिया गया।

vicky roy

1999 में, जब वह 11 वर्ष के थे,  रॉय ने भागने का फैसला किया।  उन्होंने अपने चाचा की जेब से 900 रूपये चुराए  और घर से भागकर दिल्ली आ गए । स्टेशन पर कुछ बच्चों ने उसे रोते हुए देखा, और उन्हें सलाम बलाक ट्रस्ट (एसबीटी) में ले गये , जो कि मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे’ की कमाई से बना था।

लेकिन ट्रस्ट हमेशा अंदर से बंद रहता था। और  कमरे में बंद रहना रॉय को बिलकुल भी पसंद नहीं था , इसलिए एक सुबह जब दूधवाले के लिए दरवाजे खोले गये, तो वह दूसरी बार भाग गए .वह रेलवे स्टेशन पर उन बच्चों से मिले जो रॉय को ट्रस्ट लेकर गए थे , और उन्हें अपनी कहानी बताई.  इसके बाद, उन्होंने बाकि बच्चो  के साथ कूड़ा उठाने का काम शुरू कर दिया। वे  पानी की बोतलें एकत्र करते, उसमे ठंडा पानी भरते और ट्रेन में जाकर बेच देते । ये सभी पैसे उन्हें अपने मालिक को देने होते थे जो बदले में उन्हें खाना देता लेकिन कुछ समय बाद रॉय  को लगा की इससे वह नहीं कमा सकते  इसलिए ये काम छोड़कर वे अजमेरी गेट के पास एक रेस्तरां में बर्तन धोने का काम करने लगे.  विक्की रॉय के अनुसार वह समय उसकी जिन्दगी सबसे कठिन समय था क्योकि उस समय सर्दी थी. सर्दियों के दौरान पानी ठंडा था, जिससे उनके हाथ पैरो पर कई जख्म हो गए । उन्हें अफ़सोस होता था की वह अपनी घर से क्यों  भाग कर दिल्ली आ गया . लेकिन एक दिन रॉय  की मुलाकात सलाम बलाक ट्रस्ट के एक स्वयंसेवक से हुई  जिसने उन्हें बताया कि उन्हें अभी स्कूल में होना चाहिए . साथ ही स्वयंसेवक ने बताया की उनके ट्रस्ट के कई केंद्र हैं और कुछ में आप स्कूल जा सकते हैं और साथ ही आप हर समय बंद नहीं रहेंगे। ” वह इनमे से एक  केंद्र  में शामिल हो गए, जिसका नाम अपना घर था ।

विक्की रॉय / Vicky Roy को स्कूल में 6 th क्लास में दाखिला दिया गया । रॉय ने 10 वीं बोर्ड की परीक्षा में 48 फीसदी प्राप्त किये । स्कूल के अध्यापक को एहसास हुआ कि वह पढाई में उतने अच्छे नहीं है, इसलिए उन्हें National Institute of Open Schooling में शामिल होने के लिए कहा गया , जहां वह कंप्यूटर या टीवी रिपेयर करने का  प्रशिक्षण ले सकता था। फोटोग्राफी के साथ उनका मन यही से आया, जब ट्रस्ट के दो बच्चे फोटोग्राफी में प्रशिक्षण के बाद इंडोनेशिया और श्रीलंका गए । यह देखकर विक्की रॉय के मन में भी लालच आ गया और उसने अपने अध्यापक को कहा की वह भी फोटोग्राफी सीखना चाहते है.

रॉय को पता भी नहीं था कि यह कहकर उसका जीवन हमेशा के लिए बदलने वाला है . उस समय एक ब्रिटिश फिल्म निर्माता डिक्सी बेंजामिन ट्रस्ट में documentary बनाने आये थे. तभी अध्यापक ने रॉय की मुलाकात बेंजामिन से करवाई । इस तरह विक्की रॉय बेंजामिन के सहायक बन गए, और एक फोटोग्राफर के रूप में अपनी यात्रा शुरू की.  रॉय को उस समय इंग्लिश नहीं आती थी इसलिए वह बेंजामिनकी बातों में हाँ में हाँ मिलाता । बेंजामिन ने उसे SLR का उपयोग करना सिखाया ।

रॉय जल्द ही 18 साल के होने वाले थे , और इसका मतलब था कि उन्हें सलाम बलाक ट्रस्ट छोड़ना होगा क्योकि उसमे केवल 18 साल से छोटे बच्चे ही रह सकते थे. बाकी का रहना अब अपने बलबूते पर ही करना होगा। ट्रस्ट केवल एक गैस सिलेंडर, स्टोव, मैट्रेस और बर्तन जैसी मूलभूत चीजे प्रदान करेगा: लेकिन वह ट्रस्ट के आलावा किसी ओर को नहीं जानता था। हालांकि, स्वतंत्र रहना रॉय के लिए  एक आशीर्वाद साबित हुआ क्योकि रॉय ने असिस्टेंट बनने लिए प्रसिद्ध फोटोग्राफर अनय मान से संपर्क किया . उन्होंने सहमति व्यक्त की, लेकिन एक शर्त रखी की रॉय को कम से कम तीन साल तक उसके साथ काम करना होगा

अनय मान एक अच्छे शिक्षक साबित हुए। उसने रॉय को फोटोग्राफी सिखाने के लिए  ड्राइंग का इस्तेमाल किया और प्रकाश और क्षेत्र की गहराई जैसे कॉन्सेप्ट्स से रूबरू करवाया । यह कार्य रॉय को कई जगहों पर ले गया. उनका जीवन कई बार अब शानदार होटल में बीतता था.

रॉय सड़क के बच्चों तस्वीरे खीचना शुरू किया जो 18 साल या उससे कम थे. उन बच्चो लिए कोई काम करना रॉय का लक्ष्य था। ” 2007 में उसने  ‘स्ट्रीट ड्रीम्स’ नाम की प्रदर्शनी लगायी जिसमे यह दिखाया गया थे की वह सडको पर कैसे रहता था और कैसे कबाड़ उठाता था . यह ब्रिटिश कमीशन और डीएफआईडी द्वारा प्रायोजित की गई थी  जो बहुत सफल रही। रॉय ने लंदन और दक्षिण अफ्रीका में भी प्रदर्शनी/exhibition किया जो काफी सफल रहा । यह वह समय था  जब रॉय को लगने लगा की वह भी एक बड़ा फोटोग्राफर है और उसमे घमंड आने लगा  । यह देखकर  अनय मान ने उसे बुलाया और कहा कि प्रदर्शनी से पहले वह सरल था, लेकिन अब वह घमंडी होता जा रहा है जो भविष्य के लिए बिलकुल भी अच्छा नहीं है । अपने गुरु की बात को मानते हुए उसने  वादा किया की वह अब ऐसा नहीं करेगा ।

‘स्ट्रीट ड्रीम्स’ की सफलता के बाद रॉय नई परियोजनाओं को लेकर आश्वस्त था। 2008 में, मेबा फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक वैश्विक प्रतियोगिता में भाग लिया जिसमे 5000 लोग ने हिस्सा लिया था . इसमें जितने वाले को अमेरिका जाकर छह महीने के लिए  विश्व व्यापार केंद्र (डब्ल्यूटीसी)  की फोटोग्राफ़ी  करने का मोका दिया जाना था. रॉय जितने वाले तीन फोटोग्राफरों में से एक था। ।” उनका काम डब्ल्यूटीसी 7 में प्रदर्शित हुआ, और उन्हें ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग अवार्ड से नवाज़ा गया.  रॉय को बकिंघम पैलेस में प्रिंस एडवर्ड के साथ दोपहर के भोजन के लिए आमंत्रित किया गया। यह पहली बार था जब उसने महल के बारे में सुना था। रॉय का काम कई जगहों पर जाना शुरू हुआ: जैसे व्हाइटचापल गैलरी और फ़ोटोमुस्म स्विटज़रलैंड.

2011 में विक्की रॉय ने अपने दोस्त चन्दन गोम्स के साथ एक लाइब्रेरी खोली. इसमें फोटोग्राफी की किताबें रखी गई. फोटोग्राफी  की किताबे काफी महंगी आती थी जिसे एक साधारण बच्चा नहीं खरीद सकता था.  उन्होंने सभी बड़े फोटोग्राफर को एक मेल किया और अपना उद्देश्य बताया और कहा की वे उनसे उनकी एक एक किताब लाइब्रेरी की लिए फ्री में लेना चाहते है ताकि गरीब बच्चो को फायदा हो सके. इस तरह उन्होंने करीब काफी सारी किताबे इकट्ठी की

यह लाइब्रेरी गरीब  बच्चों के लिए फोटोग्राफी  का आयोजन करता है. यह लाइब्रेरी  वर्तमान में दिल्ली के मेहरौली में ओजस आर्ट गैलरी में स्थित है।

दोस्तों यह एक कूड़ा उठाने वाले की कहानी है जो अपनी मेहनत के दम पर आज भारत के बड़े बड़े फोटोग्राफर की लिस्ट में शामिल है. किसी ने सही ही कहा है की परिक्षम वह चाबी है जो किस्मत के दरवाज़े खोलती है. कई लोग अपनी जिन्दगी हालातो का रोना रोते हुए बिता देते है तो कई हालातो को झुकाने के लिए मजबूर कर देते है. अब आपको तय करना है की आप क्या करना चाहते है?

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