History

महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की कहानी

महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की कहानी

कहा जाता है की महाराणा प्रताप का घोड़ा बहुत ही समझदार और वीर घोड़ा था। हल्दीघाटी में अकबर के साथ युद्ध के समय चेतक महाराणा प्रताप का बड़ा सहयोगी था। उस समय चेतक ने अपनी जान दांव पर लगाकर 25 फुट गहरे दरिया से कूदकर महाराणा प्रताप की रक्षा की थी| हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप विजयी हुए लेकीन युद्ध में बुरी तरह घायल होने पर महाराणा प्रताप को रणभूमि छोड़नी पड़ी थी और अंत में इसी युद्धस्थल के पास चेतक घायल हो कर उसकी मृत्यु हो गयी।

हिंदी कवि श्याम पाण्डेय द्वारा लिखी गयी कविता “चेतक की वीरता” में महाराणा प्रताप के घोड़े का पूरा वर्णन दिया हुआ हैं| हल्दीघाटी में आज भी महाराणा प्रताप के घोड़े का मंदिर बना हुआ है

चेतक

महाराणा प्रताप के साथ-साथ उनका घोड़ा भी किसी सम्माननीय शक्सियत से कम नही था।

वास्तव में महाराणा प्रताप का घोड़ा  काफी उत्तेजित और फुर्तीला था और वो खुद अपने मालिक को ढूंडता था, चेतक ने महाराणा प्रताप को ही अपने मालक के रूप में चुना था। कहा जाता है की महाराणा प्रताप और चेतक के बीच एक गहरा संबंध था। वास्तव में यदि देखा जाए तो महाराणा प्रताप भी अपने घोड़े को बहुत चाहते थे।

वह केवल इमानदार और फुर्तीला ही नही बल्कि निडर और शक्तिशाली भी था।

उस समय महाराणा प्रताप के घोड़े की अपने मालिक के प्रति वफ़ादारी किसी दुसरे राजपूत शासक से भी ज्यादा बढ़कर थी। अपने मालिक कि अंतिम साँस तक वह उन्ही के साथ था और युद्धभूमी से भी वह अपने घायल महाराज को सुरक्षित रूप से वापिस ले आया था। इस बात को देखते हुए हमें इस बात को वर्तमान में मान ही लेना चाहिए की भले ही इंसान वफादार हो या ना हो, जानवर हमेशा वफादार ही होते है।

 

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Kunwar Sahil Dadwal

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